
हिंदू पंचांग के अनुसार, दीपावली से ठीक एक दिन पहले कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को नरक चतुर्दशी मनाई जाती है। इसे छोटी दिवाली या रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मुख्य रूप से मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है। यह पूजा व्यक्ति को अपमृत्यु के भय से मुक्त करती है। साथ ही, उसे नरक की यातनाओं से भी बचाती है। आइए, जानते हैं नरक चतुर्दशी पर यमराज की पूजा का महत्व, शुभ मुहूर्त और पौराणिक कथा।
नरक चतुर्दशी क्यों मनाते हैं? पौराणिक कथा
नरक चतुर्दशी का त्योहार दो प्रमुख पौराणिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है।
1. नरकासुर वध की कथा
- पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने असुर नरकासुर का वध किया था।
- नरकासुर ने अपनी शक्ति से 16 हजार महिलाओं को बंदी बनाया हुआ था।
- भगवान कृष्ण ने उन सभी महिलाओं को मुक्ति दिलाई थी।
- इस खुशी में लोगों ने अगले दिन दीपोत्सव मनाया था।
2. यमराज और दीपदान का महत्व
- एक अन्य कथा के अनुसार, राजा रन्तिदेव को नरक प्राप्त हुआ था।
- उन्होंने यमराज से इसका कारण पूछा। यमराज ने उन्हें दीपदान न करने का कारण बताया।
- तभी से यमराज को प्रसन्न करने और अपमृत्यु से बचने के लिए दीपदान की परंपरा शुरू हुई।
यमराज पूजा और दीपदान का शुभ मुहूर्त
इस दिन यमराज को समर्पित दीपदान शाम के समय किया जाता है।
नरक चतुर्दशी 2025 शुभ मुहूर्त
| विवरण (Details) | समय (Time) |
| चतुर्दशी तिथि प्रारंभ | 19 अक्टूबर 2025, शाम 04:30 बजे |
| चतुर्दशी तिथि समाप्त | 20 अक्टूबर 2025, दोपहर 02:45 बजे |
| यमराज पूजा/दीपदान का शुभ समय | 19 अक्टूबर 2025, शाम 06:15 PM से 07:30 PM तक |
14 दीप जलाने की विधि
- इस दिन कुल 14 दीप जलाने का विधान है। ये दीप अलग-अलग स्थानों पर रखे जाते हैं।
- पहला दीप यमराज के लिए जलाया जाता है। इसे घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके रखें।
- अन्य दीप घर के पूजा स्थल, तुलसी के पौधे, बाथरूम और छत पर रखे जाते हैं।
- यम दीप जलाने से परिवार के सदस्यों पर यमराज की कृपा बनी रहती है।
नरक चतुर्दशी का पर्व सिर्फ दीपों का नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व है।




